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इस गांव में लोग डेढ़ दौ सौ सालों से नहीं मनाते श्राद्ध, भिखारी को भी नहीं देते भीख

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हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष में एक पखवारे तक घर-घर में पितरों का पूजन और तर्पण होता है। श्राद्ध सोलह संस्कारों में एक प्रमुख संस्कार है जिसे मृतक की अगली पीढ़ी अपने स्वर्गवासी पितृ की मृत्यु के उपरांत इस संस्कार को करती है। हिंदू धर्मग्रंथों की मान्यतानुसार श्राद्ध वह संस्कार है जिसे मृत्यु के बाद अगली पीढ़ी जैसे पुत्र पौत्र एवं पद्पौत्र करते है। श्राद्ध बिना पुरखों का आशीर्वाद भी नहीं माना जाता है। श्राद्ध न करने से आर्थिक संकट ,गृह क्लेश और बीमारियां आदि तमाम कष्ट हो सकते हें । ब्रहम पुराण के खंड 11 में पितृ पूजा और तर्पण के बारे में विस्तार से बताया गया है जिसमें कहा गया है कि पितृ यदि खुश हैं तो मालामाल कर दें। यदि रुष्ट हो जाएं तो खाकीन कर दें । पितरों को मनाने का 16 दिन का खास पर्व श्राद्ध जलदान शुरू हो गया।

डेढ़ दौ सौ सालों से नहीं मनाते
पितृ अमावस्या तक पितरों का पूजन और तर्पण होगा l ब्रहम पुराण के ही अनुसार जलदान पूर्णिमा के दिन पितृ धरती पर आ जाते हें और वह पितृ अमावस्या तक धरती पर ही रहते हैं। ये अवसर पितरो को तृप्त करने का होता हैl देश क्या विदेश में भी रहने वाले हिन्दू इस दौरान ब्राह्मण भोज, जलदान और पिंडदान आदि पितरों के तर्पण के लिए तमाम अनुष्ठान करते हैंl लेकिन संभल जिले के गुन्नौर तहसील के गांव भगता नगला में ग्रामीण श्राद्ध नहीं मनाते हैं l करीब डेढ़ दौ सौ साल से इस गांव के लोग श्राद्ध नहीं मनाते हैं।

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भिखारी को भी नहीं देते भीख
पूर्वजों की रीति के अनुसार लोगों ने श्राद्ध मनाना बंद किया है । श्राद्ध के दिन लोग भिखारी को भीख भी नहीं देते हैं और तो और इन सौलह दिन लोग ब्राह्मण से न तो बोलते हैं और न ही नमस्ते राम राम करते हैं । श्राद्ध बीत जाने के बाद ब्राह्मण और भिखारी से ग्रामीणों की आम दिनों की तरह दिनचर्या हो जाती है ।

क्या है कारण?
रजपुरा थाना के सीमावर्ती और गुन्नौर थाना के उपनगर बबराला से लगे गांव भगता नगला के लोग श्राद्ध न मनाने के पीछे एक ब्राह्मणी का शाप बताते हैं ।इस गांव के बुजुर्गवार और जानकारों से हमने इसके पीछे कारण जानने की कोशिश की। सभी का कहना था कि उनके पूर्वज श्राद्ध नहीं मनाते हैं इसलिए वे भी श्राद्ध नहीं मनाकर पूर्वजों की परंपरा पर कायम है।

क्या कहते है लोग?
ब्राह्मणी के बारे में लोगों का कहना है कि पड़ोस के गांव शाहजहांबाद की एक पंडितानी श्राद्ध में उनके गांव थीं। सारे दिन उन्होंने दान लिया शाम को बरसात होने लगी इस कारण उन्हें भगता नगला में ही रुकना पड़ा l अगले दिन वे अपने घर गईं तो उनके पति ने उन पर तमाम लांछन लगा कर उन्हे घर से निकाल दिया।

आज भी परंपरा कायम
लोगों का कहना है कि पंडितानी वापस भगता नगला आ गईं और आप बीती बताते हुए इस गांव के लोगों से कहा कि यदि अब किसी ने ब्राह्मण दान दिया तो उसका बहुत बुरा होगा । गांव वाले बोले बगेर ब्राहमण किस तरह विवाह और हिन्दू धर्म के संस्कार होंगे l ये सुन ब्रह्माणी ने कहा की श्राद्ध के सोलह दिन किसी ब्राहमण को न दान देना, न उससे बोलना, इस दौरान भीख भी नहीं दें यदि ये सब करोगे तो खुशहाल रहोगे और इस गांव की सीमा में पेट फूलने से किसी पशु की मौत भी नहीं होगी । गांव वाले तब से अब तक श्राद्ध न मनाने की परंपरा पर कायम है। अलबत्ता पीड़ियां बदल गई परंपरा किस सन से चालू हुई ये कोइ नहीं बता पाता है। अलबत्ता पुरखों की श्राद्ध न मनाने की परंपरा आज भी कायम है ।

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