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चंद्रबाबू नायडू के लिए 11 अप्रैल को होने वाला विधानसभा चुनाव करो या मरो का सवाल

आंध्र प्रदेश के CM चंद्रबाबू नायडू प्रभावशाली कम्मा जाति से हैं, जो राज्य की आबादी के महज तीन फीसदी हैं. उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी जगन मोहन रेड्डी के सजातीय 9 फीसदी हैं.अधिकांश जमीन  व्यापार इन्हीं दोनों जातियों के पास है. मंदिरों के प्रबंधन, शिक्षण संस्थाएं और ज्यादातर मीडिया संस्थान भी इन्हीं के हैं. इसीलिए बारी-बारी से यही सत्ता में आते हैं.  16% दलित, 23% पिछड़े, 9% मुस्लिम  27% कापू वोटरों को जो अपने पाले में कर लेता है, वही विजेता.
यही वजह है कि यहां कापू फाइनेंस कॉरपोरेशन है, ब्राह्मण फाइनेंस कॉरपोरेशन है, अल्पसंख्यकों और पिछड़ा वर्गों के लिए भी अलग वित्त निगम हैं. पॉलिटिक्स में शुरू से  रेड्डी नेताओं का वर्चस्व था, लेकिन 1982 में एनटी रामाराव के पॉलिटिक्स में प्रवेश के बाद कम्मा नेताओं का अभ्युदय हुआ  उन्होंने सत्ता पर कब्जा जमा लिया. उनके बाद उनके दामाद एन चंद्रबाबू नायडू CM बने  अटल बिहारी वाजपेयी की गवर्नमेंट बनवाने में उनकी अहम किरदार थी.

बाहुबलियों का बोलबाला

दक्षिण आंध्र प्रदेश के कडप्पा कुरनूल, रायलसीमा में सत्ता बंदूक के जोर पर चलती रही है. रायलसीमा में परिताला रेड्डी  जेसी दिवाकर रेड्डी के परिवारों के खूनी प्रयत्न पर फिल्में भी बनी हैं. कुरनूल में पूर्व मुख्यमंत्री के विजय भास्कर रेड्डी  उपमुख्यमंत्री केई कृष्णमूर्ति में पुराना प्रयत्न  है. वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के जगन मोहन रेड्डी का गढ़ कडप्पा औरअनंतपुर है वहीं चित्तूर चंद्रबाबू नायडू का.

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पदयात्रा से निकलती जीत की राह आंध्र में जो पदयात्रा करता है, चुनाव वही जीतता है.
2003 में राजशेखर रेड्डी ने पैदल प्रदेश नापा, अगले वर्ष गवर्नमेंट बनाई.
2012 में चंद्रबाबू नायडू ने 117 दिन तक 2000 किमी पदयात्रा की  दो वर्ष बाद मुख्यमंत्री बने.
इस बार जगन मोहन ने 9 महीनों में 3800 किलोमीटर की पद यात्रा की. क्या इस बार भी है संयोग अच्छा होगा?

करो या मरो

चंद्रबाबू नायडू के लिए 11 अप्रैल को होने वाला विधानसभा चुनाव करो या मरो का सवाल है. वह पूरी तरह अकेले पड़ चुके हैं. उनके विरूद्ध बीजेपी है, वाईएसआर कांग्रेस पार्टी है, पवन कल्याण की जनसेना है  कांग्रेस पार्टी भी. 72 वर्ष के नायडू संभवत: अगला चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं होंगे. लोगों को उनके बेटे नारा लोकेश में विरासत संभालने की काबिलियत नहीं दिखती. हर जनसभा में नायडू आरोप लगाते हैं कि जगन मोहन को पर्दे के पीछे से बीजेपी और पवन कल्याण का समर्थन तो है ही, उन्हें तेलंगाना के CM के चंद्रशेखर राव भी सपोर्ट कर रहे हैं. आंध्र में कांग्रेस पार्टी की उपस्थिति ना के बराबर है, इसलिए उसका समर्थन या विरोध बेमानी है.पवन कल्याण की पार्टी अधिकांश उत्तरी आंध्र में मजबूत है, जबकि जगनमोहन की पार्टी दक्षिण में. इसलिए यह दोनों एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं. वहीं तेलंगाना के CM केसीआर ने हाल ही में एक बयान में बोला कि चुनाव के बाद उनकी  जगन मोहन की किरदार राष्ट्रीय पॉलिटिक्स में बहुत जरूरी होने वाली है. राजनीतिक विश्लेषक इस बयान का निहितार्थ निकाल रहे हैं कि वे दोनों बीजेपी का दामन थाम सकते हैं.

जगन मोहन के लिए भी यह चुनाव जीवन-मरण का सवाल ही है. 2010 में पिता राजशेखर रेड्डी की मृत्यु के बाद वे कांग्रेस पार्टी से बाहर हो गए. प्रयत्न करते नौ साल हो चुके हैं. यदि उन्हें 5  सालों की प्रतीक्षा करनी पड़ी तो उन्हें स्वयं नहीं पता उनका कितना काडर पार्टी के साथ रहेगा. राजनीतिक विश्लेषक कारी श्रीराम कहते हैं, यही हालत नायडू की टीडीपी की भी हो सकती है. यदि वह यह चुनाव पराजय गए तो उनकी पार्टी में भगदड़ मच सकती है.

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