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माँ दुर्गा के इस मंदिर की है अजब कहानी

51 शक्तिपीठों के बारे में हम सभी जानते हैं। पुराणों के अनुसार जहां-जहां मां सती के अंग के टुकड़े, वस्त्र या आभूषण गिरे थे, वहां-वहां शक्तिपीठ स्थापित हो गया। इन स्थानों को अत्यन्त पवित्र माना जाता है। देवी पुराण में कुल 51 शक्तिपीठों का वर्णन है।

अब बता दें, भारत के विभाजन हो जाने के बाद इन 51 शक्तिपीठों में 1 शक्तिपीठ पाकिस्तान में, 4 बांग्लादेश में, 1 श्रीलंका में, 1 तिब्बत में और दो नेपाल में स्थित है। यानि कि वर्तमान समय में भारत में कुल 42 शक्तिपीठ ही रह गए हैं।

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आज हम आपको उस शक्तिपीठ के बारे में बताएंगे जहां सती मां का सिर गिरा था और शायद यही वजह है कि इसे सुरकंडा देवी के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर उत्तराखंड के धनौल्टी में स्थित है। सुरकुट पर्वत पर स्थित यह मंदिर समुद्रतल से करीब 3000 मीटर की ऊचांई पर है।

ऐसा कहा जाता है कि यह वही स्थान है जहां पर देवराज इंद्र ने मां की आराधना करके उनकी आर्शीवाद से अपना खोया हुआ साम्राज्य हासिल किया था।

चूंकि यह मंदिर ऊंची पहाड़ी पर स्थित है इसी वजह से यहां खड़े होकर आप चंद्रबदनी मंदिर, तुंगनाथ, चौखंबा, गौरीशंकर, नीलकंठ, दूनघाटी इत्यादि स्थानों को देख सकते हैं।

सुरकंडा देवी मंदिर का कपाट साल के पूरे दिन खुला रहता है। यहां लोग न केवल देवी मां के दर्शन को आते हैं बल्कि प्रकृति की अपार सौन्दर्य को निहारने के लिए भी यहां पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता है।

इस वजह से यहां लोगों के ठहरने के लिए होटल से लेकर धर्मशालाओं तक की सुविधा उपलब्ध है।

बता दें, यह एक इकलौता सिद्धपीठ है जहां गंगा दशहरा के मौके पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। इस दौरान यहां देवी मां के दर्शन को विशेष महत्व दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो इस समय देवी मां का दर्शन करेगा, उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होगी।

यहां गंगा दशहरा के मौके को धूमधाम से मनाए जाने के पीछे ऐसी मान्यता है कि जब राजा भागीरथ ने तप करके मां गंगा को धरती पर लाए थे तो उस समय एक धारा यहां सुरकुट पर्वत पर भी गिरी थी।

सुरकंडा देवी मंदिर में पूरे साल भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। यहां आकर भक्त मंदिर में स्थापित देवी काली की प्रतिमा का दर्शन करते हैं और उनकी कृपा प्राप्त करते हैं।

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